Bhagwati-Dhari Devi

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धारी देवी 


धारी देवी मंदिर उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित है जो अलकनंदा नदी के किनारे सृनगर और रुद्रप्रयाग के बीच स्थित है। इस मंदिर में देवी धारी की ऊपरी भाग की मूर्ति होती है जबकि मूर्ति का निचला भाग कालिमाथ में स्थित होता है, जहां वह देवी काली के रूप में पूजित की जाती है।

धारी देवी को उत्तराखंड की रक्षक देवी माना जाता है और चार धामों के संरक्षक के रूप में पूजी जाती है। वह श्रीमद् देवी भागवत द्वारा गणना की गई 108 शक्ति स्थलों में से एक है। इस मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है और लोग इसे बहुत मानते हैं।

धारी देवी मंदिर एक ऐसा स्थान है जो उत्तराखंड के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है। यहां आने वाले लोग अपने सारे दुखों को भगवान से शांति और सुख की कामना करते हैं। यहां की धारी देवी माँ से जुड़ी कथाएं भी बहुत प्रसिद्ध हैं।

माँ धारी देवी के मंदिर की आकर्षक खूबियां


धारी देवी मंदिर में माँ धारी देवी के 3 रूप देखने को मिलते हैं जो सभी को आशीर्वाद देते हैं। मंदिर में नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा आयोजित की जाती है और इस मंदिर में चैत्र और शारदीय नवरात्रि के अवसर पर हजारों श्रद्धालु प्रार्थना को पूरा करने के लिए आते हैं। यहाँ ज्यादातर नवविवाहित जोड़े भी आते हैं अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए।

  1. माँ धारी देवी उत्तराखंड की रक्षक के रूप में भी जानी जाती है और इस मंदिर में माँ शक्ति के रूप में महाकाली की पूजा भी की जाती है।
  2. धारी देवी मंदिर की पूजा धारी गाँव के पाण्डे ब्राह्मणों द्वारा की जाती है जो माँ धारी देवी के काली स्वरूप की पूजा अर्चना भी करते हैं।
  3. नवरात्रि के दौरान धारी देवी मंदिर को फूलों और लाइटों से सजाया जाता है जो देखने में बहुत खूबसूरत लगता है।


माँ धारी देवी मंदिर का इतिहास


माता धारी देवी एक बहुत ही खुशनुमा परिवार में पैदा हुई थी, जहाँ उनके सात भाई थे और वह इन सबसे बहुत प्यार करती थी। वह अपने भाइयों के लिए खाने के विभिन्न पकवान बनाती थी और उनकी मदद करती थी। यह कहानी उन दिनों की है जब माता धारी देवी केवल सात साल की थी। परन्तु जब उनके भाइयों को यह पता चला कि उनकी इकलौती बहन के ज्योतिषीय ग्रह उनके लिए अशुभ हो रहे हैं, तब उनके भाई उनसे नफरत करने लगे। वास्तव में, माता धारी देवी के सातों भाई उनसे बचपन से ही नफरत करते थे, क्योंकि उनकी त्वचा का रंग सांवला था।

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लेकिन माँ धारी देवी अपने सात भाइयों को ही अपना सब कुछ मानती थीं, क्योंकि इनके माता-पिता जल्दी ही गुजर गए थे और धारी देवी का पालन-पोषण उनके भाइयों के हाथों से ही हुआ था। उनके लिए उनके भाई ही सब कुछ थे। धीरे-धीरे समय बीतता गया और धारी माँ के भाइयों की माँ के प्रति नफरत बढ़ती गयी, परंतु एक समय ऐसा आया कि माँ के पाँच भाइयों मर गए। दो शादी-शुदा भाई ही बचे थे और उनकी परेशानी और बढ़ती गयी क्योंकि इन दो भाइयों को ऐसा लगा कि शायद हमारी इकलौती बहन के ग्रह हमारे लिए खराब होने के कारण हमारे पाँच भाइयों की मौत हुई होगी,

उन दो भाइयों को बचपन से ही यह ज्ञात था कि उनकी बहन के ग्रह हमारे लिए खराब हैं और उन्हें डर लगने लगा कि शायद अब हमारी बारी तो नहीं है इसलिए दोनों भाई मिलकर उनकी इकलौती बहन को मारने की साजिश रचने लगे। इनकी पत्नियों ने भी उन्हें यह सोचने की प्रेरणा दी कि वे अपनी बहन को मार डालें।

फिर दोनों भाइयों ने अपनी इकलौती बहन को जब वो केवल 13 साल की थी, उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया और उसका मृत शरीर रातों रात नदी के तट पर ले जाकर प्रवाहित कर दिया।

और कन्या का सिर नदी में बहता हुआ वहाँ से कल्यासौड़ के धारी नामक गांव तक पहुंच गया। एक सुबह जब धारी गांव में एक व्यक्ति नदी के किनारे पर अपने कपड़े धो रहा था, तब उसने देखा कि नदी में एक लड़की बह रही है। वह व्यक्ति कन्या को बचाने की कोशिश की, लेकिन उसे डर लग रहा था कि नदी में बहुत अधिक पानी है और वह कैसे जाएगा। उसे स्वंय के बह जाने का डर लगा और उसका हौसला टूट गया। उसने सोचा कि अब वह कन्या को नहीं बचा सकता।  

परंतु अचानक नदी से एक ऐसी आवाज आई जो उस व्यक्ति को धीरज देने लगी, जिसने कटा हुआ सिर बचाने का निर्णय लिया था।

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वो आवाज थी कि "तू घबरा मत, मैं तेरी मदद करूंगी। जहां तू पैर रखेगा, मैं वहाँ सीढ़ी बनाकर तेरी मदद करूंगी। यहाँ पहले भी इस तरह की सीढ़ियाँ बनती थीं।" कहा जाता है कि जब वह व्यक्ति नदी में एक कन्या को बचाने गया तो सच में चमत्कार हुआ। जहां उसने भी अपने पैर रखे, वहाँ-वहाँ सीढ़ियाँ बनती गईं। जब वह व्यक्ति नदी में गया तो उस व्यक्ति ने उस  कटे हुये  सिर को जब कन्या समझ कर उठाया तो वह व्यक्ति अचानक से घबरा गया वह जिसे कन्या समझ रहा था वह तो एक कट हुआ सिर है  उसे अचानक घबराहट महसूस हुई।


तब उस सिर से आवाज आई "तुम घबराओ मत, मैं एक देव रूप में हूँ और मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे एक सुन्दर और पवित्र स्थान पर एक पत्थर पर स्थापित करो।" उस व्यक्ति ने वही किया जो उस कटे हुए सिर ने उस व्यक्ति से कहा था। उस व्यक्ति के लिए भी वह किसी चमत्कार से कम नहीं था क्योंकि एक कटे हुए सिर आवाज़ दे, सीढ़ी बनाएं और रक्षा का आश्वासन दे सकता था। इससे वह व्यक्ति समझ गया कि यह एक देवी है। जब उस व्यक्ति ने उस कटे हुए सिर को एक पत्थर पर रख दिया, तब उस सिर ने अपनी कहानी बताते हुए बताया कि वह एक कन्या थी, जो सात भाइयों की एकमात्र बहन थी, और उसे दो भाइयों ने मार डाला था। इसके बाद वह सिर एक पत्थर में बदल गया।


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तब से उस पत्थर की पूजा शुरू हो गई और वहां एक सुंदर देवी मंदिर बनाया गया।जिस प्रकार रुद्रप्रयाग के कालीमठ में माँ  मैठाणी  के नाम से प्रसिद्ध हुआ , यहाँ पर भी माँ का भव्य मंदिर है और इस मंदिर को बदन वाला हिस्सा भी कहा जाता है । कालीमठ भारत में 108 शक्ति स्थलों में से एक है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, यह एक ऐसा स्थान है जहाँ देवी काली ने रक्तबीज नामक राक्षस को मार दिया था। इसके बाद देवी पृथ्वी के नीचे चली गई थी। शक्तिपीठों में कालीमठ का वर्णन पुराणों में भी मिलता है। कहा जाता है कि यहाँ पर सच्चे मन से आने वाले व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।


धारी देवी मंदिर का अनसुलझा पहेली

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धारी देवी मंदिर उत्तराखंड के चमत्कारी और रहस्यमय मंदिरों में से एक है। इस मंदिर में माँ धारी देवी की मूर्ति है, जो रंग और भाव बदलती है। सुबह सौम्य रूप में, दिन में विकराल रूप में और शाम को शांत रूप में मूर्ति दिखाई देती है। कुछ भक्तों ने एक ही दिन में मूर्ति को अलग-अलग रंगों में देखा है। माँ धारी देवी के रूप में कभी योगिनी के रूप में और कभी चांदी की छड़ी लेकर घूमती हुई बुढ़िया के रूप में भी दर्शन मिलते हैं।


माना जाता है कि जब रुद्रप्रयाग में स्थित केदारनाथ मंदिर के आसपास 16 जून 2013 को शाम 8 बजे आपदा आई थी, तब मौत का तांडव हो गया और सब कुछ तबाह हो गया इसके अलावा केवल केदारनाथ मंदिर खड़ा रहा, इसे माँ धारी देवी का क्रोध माना जाता है।


कहा जाता है कि जब सरकार के आदेश के अनुसार 303 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना के लिए रास्ता बनवाने के लिए माँ धारी देवी को उनके मूल स्थान से स्थानांतरित कर दिया गया था, तब माँ को अत्यंत क्रोध आया जिससे कि केदारनाथ के आसपास सब कुछ तबाह हो गया।

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जबकि श्रद्धालुओं और वहाँ के स्थानीय लोगों से पूछताछ के दौरान पता चलता है कि आपदा आने के 2 घंटे पहले मौसम सामान्य था। जय माँ धारी देवी।”        

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